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Showing posts from May, 2022

उत्तराखंड : ऐतिहासिक काल। ( अन्य स्वतंत्र राज्य)

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उत्तराखंड : ऐतिहासिक काल।      ( अन्य स्वतंत्र राज्य ) • शत्रुघ्न राज्य – • ह्वेनसांग ने इसे सु–लू–किन–ना नाम से संबोधित किया। • इस राज्य की पूर्वी सीमा में गंगा , मध्य में यमुना और उत्तर में हिमालय था। • इस राज्य के अंतर्गत सिरमौर , गढ़वाल क्षेत्र और अंबाला, सहारनपुर आदि क्षेत्र आते थे। • गोविषाण राज्य – • ह्वेनसांग ने इसे कु–पी–संग–ना कहा। • इसमें नैनीताल जनपद का भाभर तराई क्षेत्र ( काशीपुर) आता था। • इसके अतिरिक्त वर्तमान यूपी का पीलीभीत और रामपुर जनपद भी आते थे। • इसका विस्तार पश्चिम में रामगंगा और पूर्व में शारदा नदी तक था। • इसकी राजधानी गोविषाण( काशीपुर) में उज्जैन ग्राम के पुराने दुर्ग में थी। • सुवर्णगोत्र देश – • यह ब्रह्मपुर राज्य के उत्तर में एक स्वतंत्र देश था। • यह पूर्वी स्त्री राज्य भी कहलाता था। • कश्मीर के ललितादित्य मुक्तापिड़ और जयापीड़ द्वारा इस राज्य को जीतने का उल्लेख है। • कल्याणवर्मन का राज्य – • यह भी एक स्वतंत्र राज्य था। • इस राज्य का उल्लेख पलेठी शिलालेख में है। • इस राज्य की स्थिति देवप्रयाग के आसपास गंगा तट क्षेत्र में बताई जाती ...

उत्तराखंड में एतिहासिक काल के दौरान प्रमुख राजवंश।

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उत्तराखंड ऐतिहासिक काल – • कन्नौज का मौखरी वंश – • मौखरी शासकों ने इस क्षेत्र में अनेक देवालयों का निर्माण किया। • उत्तराखंड में नागों को परास्त करने का श्रेय मौखरी शासकों को दिया जाता है। • मौखरी राज्य का अंतिम शासक ग्रहवर्मा था। • ग्रहवर्मा की हत्या के बाद मौखरी राज्य उसके बहनोई हर्षवर्धन के अधीन हो गया। • हर्षवर्धन के काल में चीनी यात्री ह्वेमसांग ब्रह्मपुर राज्य के यात्रा पर इस क्षेत्र में आया। • ह्वेनसांग ने गोविषाण और ब्रह्मपुर राज्य के अलावा हरिद्वार और मोरध्वज क्षेत्र की भी जानकारी दी। • हर्षवर्धन की मृत्यु के बाद कान्यक्रूब्ज राज्य के अधीन तीन जनपद गोविषाण, ब्रह्मपुर और शत्रुघ्न स्वतंत्र जनपद बने। • इनमें सबसे बड़ा राज्य ब्रह्मपुर राज्य था। • ब्रह्मपुर राज्य और पौरव वंश – • यह कान्यक्रुब्ज राज्य से स्वतंत्र हुए तीन राज्यों में सर्वाधिक विस्तार वाला राज्य था। • यहां  पौरव वंश का शासन था। • पौरवों का राज्य में सबसे प्राचीन ताम्रपत्र तालेश्वर ताम्रपत्र अल्मोड़ा से प्राप्त हुआ। • इसमें द्युतिवर्मन और विष्णुवर्मन द्वितीय का उल्लेख है। • इन ताम्रपत्रों में अंडाकारा म...

उत्तराखंड : एतिहासिक काल। प्रमुख राजवंश।

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उत्तराखंड : एतिहासिक काल। ( गुप्तकाल के दौरान राज्य में प्रमुख राजवंश) • कृतपुर राज्य – • समुद्र गुप्त की प्रयाग प्रशस्ति में कृतपुर राज्य का वर्णन। • इनकी राजधानी कार्तिकेयनगर थी। • कृतपुर राज्य में गढ़वाल कुमाऊं के साथ रुहेलखंड और हिमाचल भी थे। • राजशेखर की काव्य मीमांसा में यहां एक बलशाली खसाधिपति का उल्लेख है। • विशाखदत्त के देवीचंद्रगुप्तम और बाणभट्ट के हर्षचरितम मे उसे शकपति कहा गया है। • इसी शकपती के चंद्रगुप्त के ज्येष्ठ भ्राता रामगुप्त से युद्ध का उल्लेख है। • कृतपुर राज्य पर हूणों ने आक्रमण किया। • राहुल सांकृत्यायन के अनुसार हूण राजा तोरमाण और मिहिरकुल के अधीन कुछ हिमालयी भाग रहा। • छ्गलेश राजवंश – • लाखामंडल के खंडित शिलालेख में उल्लेख। • पांचवी सदी में यह राजवंश युमना प्रदेश में शासन कर रहा था। • लाखामंडल अभिलेख में कुल 7 नरेशो के नाम क्रमबद्ध वर्णित हैं। • प्रथम नाम नरपति जयदास का है। • अतः इस क्षेत्र में इस वंश का संस्थापक नरपति जयदास माना जा सकता है।  • अन्य नरेश – • गुहेश, अचल, छगलेश दास,   • रुद्रेश दास और छ्गलेश केतु  उत्तर गुप्त काल के...

उत्तराखंड : ऐतिहासिक काल। कुणिंद शासकों के बाद अन्य वंश।

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उत्तराखंड : ऐतिहासिक काल • कुषाण शासन – • कुणिंदों के बाद मैदानी / तराई क्षेत्रों में कुषाणों ने अधिकार किया। • कनिष्क प्रथम को मध्य हिमालय के तराई क्षेत्र में अधिपत्य स्थापित करने का श्रेय दिया जाता है। • कुषाण कालीन मुद्राओं के प्राप्ति स्थल – • गोविषाण ( काशीपुर), मोरध्वज ( कोटद्वार), वीरभद्र ( ऋषिकेश) और मुनि की रेती तथा सुमाडी। • 7 कुषाण स्वर्ण मुद्राएं खटीमा के समीप कंचनपुरी से भी प्राप्त हुई हैं। • खटीमा से प्राप्त इन मुद्राओं में राजा वसु तथा मश्र के नाम अंकित हैं। • गोविषाण से वासुदेव द्वितीय की मुद्राएं, मुनि की रेती से हुविष्क की मुद्राएं प्राप्त हुई हैं। • कनिष्क की मुद्राएं "नाणक" मुद्राओं ने नाम से जानी जाती थी। • यौधेव वंश – • कुषाण शासन के पतन के बाद यौधव राजाओं ने शासन किया।  • राज्य में जौनसार बाबर और कालो डांडा क्षेत्र में इन्होंने शासन किया। • तृतीय – चतुर्थ सदी ईसवी को यौधव वंश का चरम प्रताप काल कहा जाता है। • इनकी मुद्राओं में ‘द्वि' और ‘त्रि' मुद्रा लेख अंकित थे। • इनकी ताम्र मुद्राओं में इनके अधिष्ठाता देव कार्तिकेय का चित्रण है। • ...

उत्तराखंड : ऐतिहासिक काल। कुणिंद शासन और मुद्राएं।

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उत्तराखंड : ऐतिहासिक काल  • कुणिंद शासक – • कुलिंद / पुलिंद नाम से भी जाना जाता था। • 1000 ईसा पूर्व से लगभग 200–300 ई तक शासन रहा। • कालसी शिलालेख से प्रतीत होता है, कि कुणिंद प्रारंभ में मौर्यों के अधीन थे। • इन्हें आर्यों का वंशज कहा जाता है। • वराहमिहिर ने इन्हें द्विजमुख कहा। • पुलिंद एक संस्कृत शब्द है, जिसका अर्थ जंगली है। • महाभारत के वन पर्व और सभा पर्व में कुणिंद शासक सुबाहु का उल्लेख है। • कुणिंद की जानकारी का एकमात्र स्रोत कुणिंद मुद्राएं हैं। • ये शैव धर्मावलंबी थे। कुछ बौद्ध धर्म के अनुयाई भी थे। • इनका सबसे शक्तिशाली राजा अमोघभूति था। • अमोघभूति की ताम्र और रजत मुद्राएं पश्चिम में व्यास से लेकर अलकनंदा तक तथा दक्षिण में सुनेत से लेकर बेहट तक प्राप्त हुई हैं। • कुणिंद मुद्राएं टिहरी के अठूड, खांड और उत्तरकाशी के देवढुंगा, सुमाडी , अल्मोड़ा और कत्यूर घाटी से मिले हैं। • महाभारत में कुणिंदो को द्विज और कुणिंद शासकों को द्विज श्रेष्ठ कहा गया है। • कुणिंद शासकों की राजधानी – • कलकूट ( वर्तमान कालसी)  • सुबाहुपुर ( वर्तमान श्रीनगर)  • सुधनगर( चकराता य...

उत्तराखंड : इतिहास से सम्बंधित महत्त्वपूर्ण अभिलेखीय स्रोत।

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उत्तराखंड इतिहास से सम्बंधित प्रमुख अभिलेखीय स्रोत। • कालसी शिलालेख – • सबसे प्राचीनतम शिलालेख माना जाता है। • 257 ई.पू अशोक कालीन शिलालेख है। • खोज का श्रेय – जॉन फॉरेस्ट ( 1860) • इसकी लिपि ब्राह्मी एवम भाषा प्राकृत है। • यह टोंस और यमुना नदी के संगम स्थल पर है। • इस अभिलेख में इस क्षेत्र को अपरांत और यहां के निवासियों को पुलिन्द कहा गया है। • कालसी का पुराना नाम सुधनगर या कलकुट था। • राजकुमारी ईश्वरा का अभिलेख – • यह अभिलेख जौनसार बाबर क्षेत्र में लक्षेश्वर मंदिर ( शिव मन्दिर) में स्थित है। • यह अभिलेख पांचवी सदी का माना जाता है। • इस शिलालेख के अनुसार यमुना उपत्यका में यादवों का राज्य था। • गोपेश्वर और बाड़ाहाट त्रिशुल लेख– • गोपेश्वर रुद्रशिव मंदिर में दो अभिलेख मिले हैं। • पहला 6वी सदी का नागपति नाग का और दूसरा 12वीं सदी का अशोक चल का त्रिशूल अभिलेख मिला है। • 6वी सदी के नाग वंशी अभिलेख में स्कंद नाग, विभु नाग व अंशु नाग शासकों का भी उल्लेख है। • इस अभिलेख से स्पष्ट होता है कि 6–7 वी सदी में नागपति नाग ने इस क्षेत्र को जीता था। • बाड़ाहाट त्रिशुल लेख में शंख लिपी का प...

उत्तराखंड की आदि निवासी जातियां।

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उत्तराखंड की आदिनिवासी जातियां। (1) कोल जाति– • राज्य की प्रथम निवासरत जाति मानी जाती है।      ( शिव प्रसाद डबराल के अनुसार) • साहित्यिक ग्रंथों में "शबर" नाम से वर्णन। • ये आदम जाति के कृषि व्यवसायी लोग थे। • ये प्रकृति के पुजारी थे। • कोलीय गणतंत्र पश्चिमी नेपाल का प्रमुख गणतंत्र था। • भगवान बुद्ध की माता महामाया इसी कोलीय गणतंत्र की थी। (2) किरात जाति – • जार्ज ग्रियर्सन के अनुसार किरात उत्तराखंड की प्रथम जाति थी। • अन्य नाम – किन्नर / कीर/ किरपुरुष • पुराणों में गंगा नदी,दुर्गा और पार्वती किराती नाम से संबोधित। • वर्तमान में राज्य में निवासरत शिल्पकार किरात जाति के वंशज माने जाते हैं। • ये घुम्मकड़ , आखेट और पशुचारक थे। • मुख्य खाद्य पदार्थ – सत्तू था। • पर्वतीय क्षेत्रों में गंगा घाटियों के निवासी किरात कहलाते थे। (3) खस जाति – • राजशेखर की काव्य मीमांसा में कार्तिकेयपुर शासकों को खस जाति का बताया गया है। • ये भी आखेटक, पशुचारक और वीर जाति के थे। • इन्होंने ईरान, अफगान से भारत में प्रवेश किया था। • इन्होंने किरातों को परास्त किया था। • वर्तम...

उत्तराखंड : आद्य ऐतिहासिक काल से सम्बंधित महत्त्वपूर्ण तथ्य...

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उत्तराखंड : आद्य ऐतिहासिक काल •प्रमुख स्रोत – पौराणिक ग्रंथ •उत्तराखंड का प्रथम उल्लेख – ऋग्वेद में। • ऋग्वेद में उत्तराखंड क्षेत्र का उल्लेख " देव भूमि या मनीषियों की भूमि" से मिलता है। •बद्रीनाथ का नाम सर्वप्रथम ब्राह्मण ग्रंथों में मिलता है। • एतरेव ब्राह्मण में इस क्षेत्र को "उत्तर कुरू" या कुरुओं की भूमि कहा गया है। • कौशीतिकी ब्राह्मण में वाक देवी का निवास स्थान बद्रिकाश्रम बताया गया है। महाभारत के सभा पर्व में हिमालय श्रृंखलाओं की तीन भागों में बांटा गया है। (1) अन्तगिरी (2) बहिर्गिरी (3) उपगिरी •स्कंद पुराण में हिमालय के पांच खंड। (1) कश्मीर खंड (2) जालंधर खंड (3) केदार खंड – गढ़वाल क्षेत्र (4) मानस खंड – कुमाऊं क्षेत्र (5) नेपाल खंड •केदार खंड की सीमा – माया क्षेत्र हरिद्वार से नंददेवी पर्वत(बधाण) तक •मानस खंड की सीमा – नंदा देवी पर्वत से कालगिरी तक। • पुराणों में केदार खंड और मानस खंड का सम्मानित क्षेत्र ब्रह्पुर , खसदेश या उत्तर खंड कहलाता था। • बौद्ध साहित्य के पाली ग्रंथों में इस क्षेत्र को "हिमवंत" व उशीनगर कहा जाता था...

उत्तराखंड इतिहास से सम्बंधित प्रागैतिहासिक काल के प्रमुख स्थल।

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• लाखु गुफा • लाखु गुफा की खोज –1968 में  • खोजकर्ता – एम पी जोशी • स्थिति – अल्मोड़ा ( सुयाल नदी के तट पर) • यहां प्राप्त शैलचित्रों में तीन रंगों का प्रयोग हुआ है। • इन शैलचित्राें की तुलना मध्यप्रदेश के भीमबेटका से    की जाती है। • यहां के शैलचित्रो का मुख्य विषय सामूहिक नृत्य     एवम नृत्य मंडली है  • ग्वारख्या उडयार • ग्वारख्या उडयार – चमोली  • स्थिति –डूंगरी गांव ( अलकनंदा तट) • लाल व गुलाबी रंग की पाषाणकालीन आकृतियां प्राप्त हुई हैं। • चित्रों का मुख्य विषय –पशुओं को हांका देकर भागना। • पुरातत्वविदों की नजरों में लाने का श्रेय राकेश भट्ट को जाता है। • यह गोरखों से सम्बन्धित गुफा है। • चित्रकला की दृष्टि से यहां उत्तराखंड की सबसे सुंदर कलाकृतियां मानी जाती हैं। • मलारी गांव • मलारी गांव – चमोली ( तिब्बत सीमा) • वर्ष 1983 और 2001–02 में गढ़वाल विश्वविद्यालय द्वारा सर्वेक्षण किया गया। • नर कंकाल , मिट्टी के बर्तन और जानवरों के अंग प्राप्त हुए। • 5.2 किलो सोने का मुखावरण प्राप्त हुआ। • मिट्टी के बर्तन पाकिस्तान की स्वात घाटी में मिल...

ब्रिटिश कालीन भूमि बंदोबस्त।

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कुमाऊं के भूमि बंदोबस्त। पहला –गार्डनर द्वारा ( 1815–16) दूसरा –ट्रेल ( 1816–17) तीसरा – ट्रेल ( 1818–19) चौथा – ट्रेल (1820) पांचवां – ट्रेल (1823) ( इसे पंचसाला या अस्सी साला बंदोबस्त भी कहा जाता है।) छटवा – ट्रेल ( 1829) सातवां – ट्रेल ( 1832) आठवां – ट्रेल (1833) ( ट्रेल ने कुल सात बंदोबस्त किए) नौवां – बैटन ( 1840/1843)  ( इसे बीस साला बंदोबस्त भी कहा जाता है।) दसवां – विकेट (1863 –73) ( पहली बार वैज्ञानिक पद्धति से बंदोबस्त किया गया।) ग्याहरवा –गूंज (1899–1902) कुमाऊं में। गढ़वाल में –1887 के आसपास ई• पौ ने बंदोबस्त किया। गढ़वाल में –1928 में इंब्ट्सन ने बंदोबस्त किया। ©®Ukssscexamcracker

उत्तराखंड से सम्बंधित महत्त्वपूर्ण प्रश्न एवम उत्तर।

डाक सुविधा हेतु अल्मोड़ा में तार व्यवस्था शुरू की गई – 14 अप्रैल 1914 देहरादून में डाकघर की स्थापना हुई – 1893 अल्मोड़ा में डाक घर की स्थापन हुई – 1905 भूसुधार हेतु ट्रेल द्वारा किए "अस्सी साला बंदोबस्त " किस वर्ष किया गया –1820 कुमाऊं का प्रथम वैज्ञानिक भू बंदोबस्त माना जाता है – 10वां बंदोबस्त ( 1863, विकेट द्वारा ) कुमाऊं हेतु पृथक न्याय विभाग की स्थापना की गई – 1914 में। अल्मोड़ा तहसील का सृजन किया गया – 1817 में ट्रेल द्वारा। अल्मोड़ा जेल का निर्माण किया गया – 1816 में। पौड़ी जेल का निर्माण किया गया – 1827 में। नैनीताल तथा हल्द्वानी में जेलों का निर्माण किया गया – 1902 में। वर्तमान स्थान पर स्थित अल्मोड़ा जेल कब बनाई गई – 1872 में। ©®Ukssscexamcraker

गोरखा शासन से सम्बंधित महत्त्वपूर्ण प्रश्न।

✓ गढ़वाल में गोरखा - अंग्रेज़ युद्ध के समय (1814) में भारत का गवर्नर जनरल था - लॉर्ड हेंस्टिंग। ✓ खलंगा युद्ध ( 1814) देहरादून में गोरखों के खिलाफ युद्ध में अंग्रेज सेनापति था - मेजर जनरल जिलेस्पी। ✓ खलंगा युद्ध के दौरान गोरखा सेनापति था - बलभद्र थापा। ✓ किस गोरखा शासक को मौलाराम ने दानवीर कर्ण की उपाधि दी - रणजोर सिंह थापा को। ✓ गोरखा शासकों द्वारा किस सिक्ख धर्म गुरु को "कढ़ाई दीप" नामक सजा दी थी - महंत हरसेवक को। ✓ सबसे क्रूर एवम अत्याचारी किस गोरखा शासक को माना जाता है - भैरों थापा को।( 1808 - 1811) ✓ नेपाल सरकार का सर्वश्रेष्ठ अलंकार " काजी " से किस गोरखा सेनापति को सम्मानित किया गया - अमर सिंह थापा। ✓ घुरही - पिछही क्या था - गोरखा शासन के दौरान कर। ✓ गढ़वाल नरेश प्रद्युम्न शाह कब वीरगति को प्राप्त हुए - 14 मई 1804 ( खुड़बुडा युद्ध)  ©®Ukssscexamcraker

टिहरी रियासत के नरेशों का कालक्रम।

गढ़वाल नरेश ( टिहरी रियासत )  ✓ सुदर्शन शाह - टिहरी रियासत के प्रथम नरेश ( 1815-1859 तक)   ✓ भवानी शाह - ( 1859-1871 तक)   ✓ प्रताप शाह - (1871-1886 तक) रियासत में अंग्रेजी शिक्षा की शुरुवात करने का श्रेय भवानी शाह को दिया जाता है।  ✓ कीर्ति शाह - (1886 - 1913 तक) ( 1898 में CSI की उपाधि दी गई)   ✓ नरेंद्र शाह - (1913-1946 तक) ( रियासत समाप्त करने की मांगों को लेकर सबसे ज्यादा जन आंदोलन इनके ही कार्यकाल में हुए।  ✓ मानवेंद्र शाह - ( 1946-1949 तक) ( अन्तिम टिहरी नरेश)   ©®Examcrakeruksssc