उत्तराखंड की आदि निवासी जातियां।



उत्तराखंड की आदिनिवासी जातियां।

(1) कोल जाति–

• राज्य की प्रथम निवासरत जाति मानी जाती है।
     ( शिव प्रसाद डबराल के अनुसार)
• साहित्यिक ग्रंथों में "शबर" नाम से वर्णन।
• ये आदम जाति के कृषि व्यवसायी लोग थे।
• ये प्रकृति के पुजारी थे।
• कोलीय गणतंत्र पश्चिमी नेपाल का प्रमुख गणतंत्र था।
• भगवान बुद्ध की माता महामाया इसी कोलीय गणतंत्र की थी।

(2) किरात जाति –

• जार्ज ग्रियर्सन के अनुसार किरात उत्तराखंड की प्रथम जाति थी।
• अन्य नाम – किन्नर / कीर/ किरपुरुष
• पुराणों में गंगा नदी,दुर्गा और पार्वती किराती नाम से संबोधित।
• वर्तमान में राज्य में निवासरत शिल्पकार किरात जाति के वंशज माने जाते हैं।
• ये घुम्मकड़ , आखेट और पशुचारक थे।
• मुख्य खाद्य पदार्थ – सत्तू था।
• पर्वतीय क्षेत्रों में गंगा घाटियों के निवासी किरात कहलाते थे।


(3) खस जाति –

• राजशेखर की काव्य मीमांसा में कार्तिकेयपुर शासकों को खस जाति का बताया गया है।
• ये भी आखेटक, पशुचारक और वीर जाति के थे।
• इन्होंने ईरान, अफगान से भारत में प्रवेश किया था।
• इन्होंने किरातों को परास्त किया था।
• वर्तमान में सिर्फ हिमांचल प्रदेश में ही खस जाति मिलती है।
• बंगाल के पाल शासकों के अभिलेखों में अशोक चल्ल का नाम और इस क्षेत्र को खस देश कहा गया है।
• वृहत संहिता में खसों को तंगा कहा गया है।
• खस जाति को गुप्तों के समकालीन माना जाता है।
• घरजावाइं , जेंठो, टेकुवा और देवदासी प्रथाएं प्रचलित थी।

(4) शक जाति –

• हिमाचल और उत्तराखंड में दूसरी से तीसरी शताब्दी में यह जाति आ बसी थी।
• ये पश्चिमी एशिया से आए थे।
• ये पशुचारक और अश्व पालक थे।
• राहुल सांकृत्यायन के अनुसार खस का अपभ्रंश ही शक था।
•राज्य में स्थित सूर्य मंदिरों से शकों के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं।
• सूर्य शकों के आराध्य देव माने जाते हैं।
• कनिंघम के अनुसार अंतिम मौर्य नरेश राजपाल को इस क्षेत्र के शक राजा शाकादित्य द्वारा मारा गया था।
• कत्यूरी शासकों को भी शकों से संबंधित माना जाता है।

• अन्य महत्वपूर्ण तथ्य–

• वन पर्व के अनुसार श्रीनगर के निकट किरात महादेव शिव से पांडुपुत्र अर्जुन का युद्ध हुआ था।
• शिव किरात जाति के नेता माने जाते थे।
• इस युद्ध को तुमुल संग्राम से जाना जाता है।
• इस युद्ध का स्कंद पुराण के केदार खंड में विस्तृत वर्णन है।
• इस युद्ध का स्थल विल्लव केदार ( श्रीनगर गढ़वाल) था।
• यह विल्लव केदार शिव प्रयाग नाम से प्रसिद्ध है।
• जाखन देवी मंदिर ( अल्मोड़ा) यक्षों के निवास की पुष्टि करता है।
• बीनाग या बेरीनाग मंदिर पिथौरागढ़ नागों के निवास की पुष्टि करता है।
• किरात जाति के वंशज मुंडा आज भी असकोट और डीडीहाट क्षेत्र में निवास करते हैं।


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