उत्तराखंड में एतिहासिक काल के दौरान प्रमुख राजवंश।

उत्तराखंड ऐतिहासिक काल –


कन्नौज का मौखरी वंश –

• मौखरी शासकों ने इस क्षेत्र में अनेक देवालयों का निर्माण किया।
• उत्तराखंड में नागों को परास्त करने का श्रेय मौखरी शासकों को दिया जाता है।
• मौखरी राज्य का अंतिम शासक ग्रहवर्मा था।
• ग्रहवर्मा की हत्या के बाद मौखरी राज्य उसके बहनोई हर्षवर्धन के अधीन हो गया।
• हर्षवर्धन के काल में चीनी यात्री ह्वेमसांग ब्रह्मपुर राज्य के यात्रा पर इस क्षेत्र में आया।
• ह्वेनसांग ने गोविषाण और ब्रह्मपुर राज्य के अलावा हरिद्वार और मोरध्वज क्षेत्र की भी जानकारी दी।
• हर्षवर्धन की मृत्यु के बाद कान्यक्रूब्ज राज्य के अधीन तीन जनपद गोविषाण, ब्रह्मपुर और शत्रुघ्न स्वतंत्र जनपद बने।
• इनमें सबसे बड़ा राज्य ब्रह्मपुर राज्य था।


ब्रह्मपुर राज्य और पौरव वंश –

• यह कान्यक्रुब्ज राज्य से स्वतंत्र हुए तीन राज्यों में सर्वाधिक विस्तार वाला राज्य था।
• यहां  पौरव वंश का शासन था।
• पौरवों का राज्य में सबसे प्राचीन ताम्रपत्र तालेश्वर ताम्रपत्र अल्मोड़ा से प्राप्त हुआ।
• इसमें द्युतिवर्मन और विष्णुवर्मन द्वितीय का उल्लेख है।
• इन ताम्रपत्रों में अंडाकारा मुद्रा के साथ वृषभ,मछली, कछुआ और गरुड़ की आकृतियां हैं।
• इन अभिलेखों में संस्कृत भाषा और गुप्त ब्राह्मी लिपि का प्रयोग किया गया है।
• मुद्राओं में कुटिला लिपी भी अंकित है।
• पौरवों से संबंधित इस तालेश्वर ताम्रपत्र की खोज 1915 में हुई।
• पौरव वंश के संस्थापक विष्णुवर्मन थे।
• अंतिम नरेश विष्णुवर्मन द्वितीय थे।


पौरव वंश ( अन्य महत्वपूर्ण तथ्य)–

• पौरव ताम्रपत्र और राज मुद्राओं में इनकी वंशावली निम्न है।
(1) विष्णुवर्मन (2) वृषवर्मन (3)अग्निवर्मन (4) द्युतिवर्मन (5) विष्णुवर्मन द्वितीय
• इनके कुल देवता विणेश्वर  स्वामी माने जाते हैं।
• विणेश्वर महादेव का मंदिर चौथान पट्टी , बीनो नदी की धारा के पास आज भी अपना ऐतिहासिक महत्व रखता है।
• इस मंदिर को बिनसर महादेव भी कहा जाता है। यह शिव मंदिर है।
• हर्ष के बांसखेड़ा और मधुवन ताम्रपत्रों में भी पौरवों का उल्लेख है।
• पौरवो की भू मापन इकाई तीन प्रकार की थी।
 (1) द्रोणवाप (2) कुल्यवाप (3) खारिवाप
• इनके आय का स्रोत भू कर था, जिसे भाग कहा जाता था।
• भू कर वसूलने वाले अधिकारी को मार्गक कहा जाता था।


• इनकी मुख्यत दो प्रकार की भूमि थी।
(1) केदार भूमि ( सिंचित भूमि)
(2) सारी भूमि ( असिंचित भूमि)

पौरव शासन के दौरान पदाधिकारी –
• सेनानायक – बालाध्यक्ष
• भूमि सर्वेक्षक – प्रमातार
• विदेश मंत्री – संधि विग्रहिक
• भूमि अधिकारी – भागिक
• गुप्तचर – कटुक
• प्रांताधिकारी – भौक्तिक
• लेखक – दिविरकोट
• कर अधिकारी – भोगिक

• इनके निवास स्थल कोट कहलाते थे।

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