उत्तराखंड : आद्य ऐतिहासिक काल से सम्बंधित महत्त्वपूर्ण तथ्य...
उत्तराखंड : आद्य ऐतिहासिक काल
•प्रमुख स्रोत – पौराणिक ग्रंथ
•उत्तराखंड का प्रथम उल्लेख – ऋग्वेद में।
• ऋग्वेद में उत्तराखंड क्षेत्र का उल्लेख " देव भूमि या मनीषियों की भूमि" से मिलता है।
•बद्रीनाथ का नाम सर्वप्रथम ब्राह्मण ग्रंथों में मिलता है।
• एतरेव ब्राह्मण में इस क्षेत्र को "उत्तर कुरू" या कुरुओं की भूमि कहा गया है।
• कौशीतिकी ब्राह्मण में वाक देवी का निवास स्थान बद्रिकाश्रम बताया गया है।
महाभारत के सभा पर्व में हिमालय श्रृंखलाओं की तीन भागों में बांटा गया है।
(1) अन्तगिरी (2) बहिर्गिरी (3) उपगिरी
•स्कंद पुराण में हिमालय के पांच खंड।
(1) कश्मीर खंड
(2) जालंधर खंड
(3) केदार खंड – गढ़वाल क्षेत्र
(4) मानस खंड – कुमाऊं क्षेत्र
(5) नेपाल खंड
•केदार खंड की सीमा – माया क्षेत्र हरिद्वार से नंददेवी पर्वत(बधाण) तक
•मानस खंड की सीमा – नंदा देवी पर्वत से कालगिरी तक।
• पुराणों में केदार खंड और मानस खंड का सम्मानित क्षेत्र ब्रह्पुर , खसदेश या उत्तर खंड कहलाता था।
• बौद्ध साहित्य के पाली ग्रंथों में इस क्षेत्र को "हिमवंत" व उशीनगर कहा जाता था।
•केदारखंड में गढ़वाल की सीमा –
• लंबाई – 50 योजन
•चौड़ाई – 30 योजन
•पश्चिम से पूर्व की सीमा – तमसा ( टोंस) से बधाण पट्टी ( बधाण पर्वत) तक
•दक्षिणी से उत्तर की सीमा –गंगा द्वार हरिद्वार से श्वेत पर्वत ( हिमालय तक)
• महाभारत के आदि पर्व में उत्तर कुरू और दक्षिण कुरू दो देशों का उल्लेख है।
• व्यास गुफा ( बद्रिकाश्रम) में ब्रह्म हत्या निवारण हेतु जन्मेजय ने व्यास जी से महाभारत की कथा सुनी।
• महाभारत में देवप्रयाग को समस्त तीर्थों की शिरोमणि तथा समग्र पापों का विनाशक कहा गया है।
• महर्षि व्यास जी द्वारा बद्रिकाश्रम में "षष्टीलक्ष संहिता" की रचना की गई।
• ऋग्वेद में गढ़वाल क्षेत्र में असुर राजा शम्बर का उल्लेख है।जिसके 100 गढ़ों को इंद्र और सुदास ने नष्ट किया था।
• कुबेर की राजधानी अलकापुरी थी। इसी अलकापुरी को आदि पूर्वज मनु का जन्मस्थल माना जाता है।
• ऋग्वेद में उल्लेखित " सप्तसिंधु देश" को गढ़वाल क्षेत्र ही माना जाता है।
( हरिराम धस्माना,शिवानंद नौटियाल और भजन सिंह का मत)
•टिहरी गढ़वाल की हिमयाण पट्टी के विषोन पर्वत पर वशिष्ट गुफा, वशिष्ट कुंड और वशिष्ट आश्रम हैं।
( यहां वशिष्ट और उनकी पत्नी अरुंधती का निवास स्थल माना जाता है।)
•पौड़ी के सितोस्यूं पट्टी क्षेत्र को सीता माता से संबंधित माना जाता है।
( मान्यता है कि सीता माता इसी क्षेत्र में धरती में समाई थीं)
• इसी सितोस्यूं पट्टी क्षेत्र में प्रतिवर्ष "मनसार मेला" लगता है।
• रामायण कालीन बाणासुर का राज्य भी गढ़वाल क्षेत्र माना जाता है।
• राजधानी –ज्योतिषपुर(जोशीमठ)
• देवप्रयाग में भगवान राम का प्राचीन मंदिर है।
( माना जाता है की भगवान राम ने अपने अंतिम समय में यहां तपस्या की थी।
• महाभारत के वन पर्व में केदारनाथ को "भृगतुंग" कहा गया है।
•महाभारत के आदि पर्व के अनुसार गंगा द्वार का राजा नागराज कौरव्य था।
• अर्जुन का विवाह कौरव्य की पुत्री उलूपी से गंगा द्वार में ही हुआ। ( आदि पर्व के अनुसार)
• महाभारत के वन पर्व, सभा पर्व, आरण्य पर्व और भीष्म पर्व में "कुणींद" शासन का उल्लेख है।
• महाभारत के वन पर्व के में उल्लेख –
(1) हरिद्वार से केदारनाथ के बीच यात्रा स्थलों का उल्लेख।
(2) लोमश ऋषि के साथ पांडवों का इस क्षेत्र में आने का उल्लेख।
(3) इस क्षेत्र में कुणींद ( पुलिंद) और किरात जातियों के अधिपत्य का उल्लेख।
(4) कुणिद राजा सुबाहु और उसकी राजधानी सुबाहुपुर ( वर्तमान श्रीनगर गढ़वाल) का उल्लेख।
(5) सुबाहु के बाद राजा विराट का उल्लेख।
(6) राजा विराट की राजधानी विराटगढ़ी ( जौनसार) में थी।
(7) राजा विराट की पुत्री उत्तरा से अभिमन्यु के विवाह का उल्लेख।
• प्राचीन काल में बद्रिकाश्रम और कर्णवाश्रम दो विद्यापीठ थे।
• कणवाश्रम – कोटद्वार ( मालिनी नदी के तट पर)
वर्तमान में – चौकाघाट के नाम से जाना जाता है।
• कणवाश्रम में ही कालिदास ने अभिज्ञान शाकुंतलम की रचना की थी।
( यह विद्यापीठ शकुंतला और दुष्यंत की प्रेम कथा के लिए भी प्रसिद्ध है।)
• यह आश्रम चक्रवती सम्राट भरत की भी जन्म स्थली है।
• यहां प्रति वर्ष बसंत पंचमी पर मेला लगता है।
• प्राचीन काल में केदार क्षेत्र में खस जाति के लोग शसक्त थे।
• खसों के समय केदार क्षेत्र में बौद्ध धर्म का प्रचार प्रसार अधिक हुआ।
• कालिदास के मेघदूत में कनखल ( हरिद्वार) का उल्लेख है। ( अलकापुरी का भी उल्लेख है।)
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