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उत्तराखंड की महत्वपूर्ण पुस्तकें।

1) मेम्वायर्स ऑफ देहरादून           – 1874 (जीआरसी विलियम्स) 2) हिमालय डिस्ट्रिक्ट गजेटियर        – 1882  (1886 एटकिंशन) 3) गढ़वाल ( देहरादून) गजेटियर        – 1911 (एचसी वाल्टन) 4) अल्मोड़ा गजेटियर      – 1928 (एचसी वाल्टन) 5) होली हिमालय       – 1905 (ई सरमन ओकले) 6) गढ़वाल एनशियेंट एंड मॉर्डन    – 1917 (पतिराम) 7) हिमालय ट्रेवल्स     –1920 (जोध सिंह नेगी) 8) गढ़वाल राज्य का इतिहास     – 1920 (विजयराम रतूड़ी) 9) गढ़वाल का इतिहास       – 1928 (हरिकृष्ण रतूड़ी) 10) हिमालय फॉकलोर      – 1935 (तरादत्त गैरोला और ऑकले) 11) कुमाऊं का इतिहास       – 1937 (बद्रीदत्त पांडे) 12) हिमालय की यात्रा     – 1948 (काका साहेब कालेकर) 13) गढ़वाल की दिवंगत विभूतियां     – 1980 (भक्तदर्शन) 14) उत्तराखण्ड का नवीन इतिहास       – 2006 (यशवंत सिंह कठौच)

उत्तराखंड : ऐतिहासिक काल। ( अन्य स्वतंत्र राज्य)

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उत्तराखंड : ऐतिहासिक काल।      ( अन्य स्वतंत्र राज्य ) • शत्रुघ्न राज्य – • ह्वेनसांग ने इसे सु–लू–किन–ना नाम से संबोधित किया। • इस राज्य की पूर्वी सीमा में गंगा , मध्य में यमुना और उत्तर में हिमालय था। • इस राज्य के अंतर्गत सिरमौर , गढ़वाल क्षेत्र और अंबाला, सहारनपुर आदि क्षेत्र आते थे। • गोविषाण राज्य – • ह्वेनसांग ने इसे कु–पी–संग–ना कहा। • इसमें नैनीताल जनपद का भाभर तराई क्षेत्र ( काशीपुर) आता था। • इसके अतिरिक्त वर्तमान यूपी का पीलीभीत और रामपुर जनपद भी आते थे। • इसका विस्तार पश्चिम में रामगंगा और पूर्व में शारदा नदी तक था। • इसकी राजधानी गोविषाण( काशीपुर) में उज्जैन ग्राम के पुराने दुर्ग में थी। • सुवर्णगोत्र देश – • यह ब्रह्मपुर राज्य के उत्तर में एक स्वतंत्र देश था। • यह पूर्वी स्त्री राज्य भी कहलाता था। • कश्मीर के ललितादित्य मुक्तापिड़ और जयापीड़ द्वारा इस राज्य को जीतने का उल्लेख है। • कल्याणवर्मन का राज्य – • यह भी एक स्वतंत्र राज्य था। • इस राज्य का उल्लेख पलेठी शिलालेख में है। • इस राज्य की स्थिति देवप्रयाग के आसपास गंगा तट क्षेत्र में बताई जाती ...

उत्तराखंड में एतिहासिक काल के दौरान प्रमुख राजवंश।

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उत्तराखंड ऐतिहासिक काल – • कन्नौज का मौखरी वंश – • मौखरी शासकों ने इस क्षेत्र में अनेक देवालयों का निर्माण किया। • उत्तराखंड में नागों को परास्त करने का श्रेय मौखरी शासकों को दिया जाता है। • मौखरी राज्य का अंतिम शासक ग्रहवर्मा था। • ग्रहवर्मा की हत्या के बाद मौखरी राज्य उसके बहनोई हर्षवर्धन के अधीन हो गया। • हर्षवर्धन के काल में चीनी यात्री ह्वेमसांग ब्रह्मपुर राज्य के यात्रा पर इस क्षेत्र में आया। • ह्वेनसांग ने गोविषाण और ब्रह्मपुर राज्य के अलावा हरिद्वार और मोरध्वज क्षेत्र की भी जानकारी दी। • हर्षवर्धन की मृत्यु के बाद कान्यक्रूब्ज राज्य के अधीन तीन जनपद गोविषाण, ब्रह्मपुर और शत्रुघ्न स्वतंत्र जनपद बने। • इनमें सबसे बड़ा राज्य ब्रह्मपुर राज्य था। • ब्रह्मपुर राज्य और पौरव वंश – • यह कान्यक्रुब्ज राज्य से स्वतंत्र हुए तीन राज्यों में सर्वाधिक विस्तार वाला राज्य था। • यहां  पौरव वंश का शासन था। • पौरवों का राज्य में सबसे प्राचीन ताम्रपत्र तालेश्वर ताम्रपत्र अल्मोड़ा से प्राप्त हुआ। • इसमें द्युतिवर्मन और विष्णुवर्मन द्वितीय का उल्लेख है। • इन ताम्रपत्रों में अंडाकारा म...

उत्तराखंड : एतिहासिक काल। प्रमुख राजवंश।

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उत्तराखंड : एतिहासिक काल। ( गुप्तकाल के दौरान राज्य में प्रमुख राजवंश) • कृतपुर राज्य – • समुद्र गुप्त की प्रयाग प्रशस्ति में कृतपुर राज्य का वर्णन। • इनकी राजधानी कार्तिकेयनगर थी। • कृतपुर राज्य में गढ़वाल कुमाऊं के साथ रुहेलखंड और हिमाचल भी थे। • राजशेखर की काव्य मीमांसा में यहां एक बलशाली खसाधिपति का उल्लेख है। • विशाखदत्त के देवीचंद्रगुप्तम और बाणभट्ट के हर्षचरितम मे उसे शकपति कहा गया है। • इसी शकपती के चंद्रगुप्त के ज्येष्ठ भ्राता रामगुप्त से युद्ध का उल्लेख है। • कृतपुर राज्य पर हूणों ने आक्रमण किया। • राहुल सांकृत्यायन के अनुसार हूण राजा तोरमाण और मिहिरकुल के अधीन कुछ हिमालयी भाग रहा। • छ्गलेश राजवंश – • लाखामंडल के खंडित शिलालेख में उल्लेख। • पांचवी सदी में यह राजवंश युमना प्रदेश में शासन कर रहा था। • लाखामंडल अभिलेख में कुल 7 नरेशो के नाम क्रमबद्ध वर्णित हैं। • प्रथम नाम नरपति जयदास का है। • अतः इस क्षेत्र में इस वंश का संस्थापक नरपति जयदास माना जा सकता है।  • अन्य नरेश – • गुहेश, अचल, छगलेश दास,   • रुद्रेश दास और छ्गलेश केतु  उत्तर गुप्त काल के...

उत्तराखंड : ऐतिहासिक काल। कुणिंद शासकों के बाद अन्य वंश।

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उत्तराखंड : ऐतिहासिक काल • कुषाण शासन – • कुणिंदों के बाद मैदानी / तराई क्षेत्रों में कुषाणों ने अधिकार किया। • कनिष्क प्रथम को मध्य हिमालय के तराई क्षेत्र में अधिपत्य स्थापित करने का श्रेय दिया जाता है। • कुषाण कालीन मुद्राओं के प्राप्ति स्थल – • गोविषाण ( काशीपुर), मोरध्वज ( कोटद्वार), वीरभद्र ( ऋषिकेश) और मुनि की रेती तथा सुमाडी। • 7 कुषाण स्वर्ण मुद्राएं खटीमा के समीप कंचनपुरी से भी प्राप्त हुई हैं। • खटीमा से प्राप्त इन मुद्राओं में राजा वसु तथा मश्र के नाम अंकित हैं। • गोविषाण से वासुदेव द्वितीय की मुद्राएं, मुनि की रेती से हुविष्क की मुद्राएं प्राप्त हुई हैं। • कनिष्क की मुद्राएं "नाणक" मुद्राओं ने नाम से जानी जाती थी। • यौधेव वंश – • कुषाण शासन के पतन के बाद यौधव राजाओं ने शासन किया।  • राज्य में जौनसार बाबर और कालो डांडा क्षेत्र में इन्होंने शासन किया। • तृतीय – चतुर्थ सदी ईसवी को यौधव वंश का चरम प्रताप काल कहा जाता है। • इनकी मुद्राओं में ‘द्वि' और ‘त्रि' मुद्रा लेख अंकित थे। • इनकी ताम्र मुद्राओं में इनके अधिष्ठाता देव कार्तिकेय का चित्रण है। • ...

उत्तराखंड : ऐतिहासिक काल। कुणिंद शासन और मुद्राएं।

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उत्तराखंड : ऐतिहासिक काल  • कुणिंद शासक – • कुलिंद / पुलिंद नाम से भी जाना जाता था। • 1000 ईसा पूर्व से लगभग 200–300 ई तक शासन रहा। • कालसी शिलालेख से प्रतीत होता है, कि कुणिंद प्रारंभ में मौर्यों के अधीन थे। • इन्हें आर्यों का वंशज कहा जाता है। • वराहमिहिर ने इन्हें द्विजमुख कहा। • पुलिंद एक संस्कृत शब्द है, जिसका अर्थ जंगली है। • महाभारत के वन पर्व और सभा पर्व में कुणिंद शासक सुबाहु का उल्लेख है। • कुणिंद की जानकारी का एकमात्र स्रोत कुणिंद मुद्राएं हैं। • ये शैव धर्मावलंबी थे। कुछ बौद्ध धर्म के अनुयाई भी थे। • इनका सबसे शक्तिशाली राजा अमोघभूति था। • अमोघभूति की ताम्र और रजत मुद्राएं पश्चिम में व्यास से लेकर अलकनंदा तक तथा दक्षिण में सुनेत से लेकर बेहट तक प्राप्त हुई हैं। • कुणिंद मुद्राएं टिहरी के अठूड, खांड और उत्तरकाशी के देवढुंगा, सुमाडी , अल्मोड़ा और कत्यूर घाटी से मिले हैं। • महाभारत में कुणिंदो को द्विज और कुणिंद शासकों को द्विज श्रेष्ठ कहा गया है। • कुणिंद शासकों की राजधानी – • कलकूट ( वर्तमान कालसी)  • सुबाहुपुर ( वर्तमान श्रीनगर)  • सुधनगर( चकराता य...

उत्तराखंड : इतिहास से सम्बंधित महत्त्वपूर्ण अभिलेखीय स्रोत।

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उत्तराखंड इतिहास से सम्बंधित प्रमुख अभिलेखीय स्रोत। • कालसी शिलालेख – • सबसे प्राचीनतम शिलालेख माना जाता है। • 257 ई.पू अशोक कालीन शिलालेख है। • खोज का श्रेय – जॉन फॉरेस्ट ( 1860) • इसकी लिपि ब्राह्मी एवम भाषा प्राकृत है। • यह टोंस और यमुना नदी के संगम स्थल पर है। • इस अभिलेख में इस क्षेत्र को अपरांत और यहां के निवासियों को पुलिन्द कहा गया है। • कालसी का पुराना नाम सुधनगर या कलकुट था। • राजकुमारी ईश्वरा का अभिलेख – • यह अभिलेख जौनसार बाबर क्षेत्र में लक्षेश्वर मंदिर ( शिव मन्दिर) में स्थित है। • यह अभिलेख पांचवी सदी का माना जाता है। • इस शिलालेख के अनुसार यमुना उपत्यका में यादवों का राज्य था। • गोपेश्वर और बाड़ाहाट त्रिशुल लेख– • गोपेश्वर रुद्रशिव मंदिर में दो अभिलेख मिले हैं। • पहला 6वी सदी का नागपति नाग का और दूसरा 12वीं सदी का अशोक चल का त्रिशूल अभिलेख मिला है। • 6वी सदी के नाग वंशी अभिलेख में स्कंद नाग, विभु नाग व अंशु नाग शासकों का भी उल्लेख है। • इस अभिलेख से स्पष्ट होता है कि 6–7 वी सदी में नागपति नाग ने इस क्षेत्र को जीता था। • बाड़ाहाट त्रिशुल लेख में शंख लिपी का प...