उत्तराखंड : ऐतिहासिक काल। ( अन्य स्वतंत्र राज्य)

उत्तराखंड : ऐतिहासिक काल।
     ( अन्य स्वतंत्र राज्य )


शत्रुघ्न राज्य –

• ह्वेनसांग ने इसे सु–लू–किन–ना नाम से संबोधित किया।
• इस राज्य की पूर्वी सीमा में गंगा , मध्य में यमुना और उत्तर में हिमालय था।
• इस राज्य के अंतर्गत सिरमौर , गढ़वाल क्षेत्र और अंबाला, सहारनपुर आदि क्षेत्र आते थे।

गोविषाण राज्य –

• ह्वेनसांग ने इसे कु–पी–संग–ना कहा।
• इसमें नैनीताल जनपद का भाभर तराई क्षेत्र ( काशीपुर) आता था।
• इसके अतिरिक्त वर्तमान यूपी का पीलीभीत और रामपुर जनपद भी आते थे।
• इसका विस्तार पश्चिम में रामगंगा और पूर्व में शारदा नदी तक था।
• इसकी राजधानी गोविषाण( काशीपुर) में उज्जैन ग्राम के पुराने दुर्ग में थी।


सुवर्णगोत्र देश –

• यह ब्रह्मपुर राज्य के उत्तर में एक स्वतंत्र देश था।
• यह पूर्वी स्त्री राज्य भी कहलाता था।
• कश्मीर के ललितादित्य मुक्तापिड़ और जयापीड़ द्वारा इस राज्य को जीतने का उल्लेख है।

कल्याणवर्मन का राज्य –

• यह भी एक स्वतंत्र राज्य था।
• इस राज्य का उल्लेख पलेठी शिलालेख में है।
• इस राज्य की स्थिति देवप्रयाग के आसपास गंगा तट क्षेत्र में बताई जाती है।
• हिंडोलाखाल स्थित पलेठी का सूर्य मंदिर कल्याणवर्मन और नरपतिवर्मन आदि द्वारा ही बनाया गया था।
• पलेठी शिलालेख में कल्याणवर्मन और नरपतिवर्मन का उल्लेख है।

त्रयंबकपुर राज्य –

• इस राज्य में कत्यूरी घाटी में बैजनाथ के आसपास का क्षेत्र आता था।

दीपपुरी – 
• यह राज्य बागेश्वर क्षेत्र में स्थित था।

• गढ़वाल के दक्षिण में स्थित पांडुवाला और मोरध्वज में भी लघु स्वतंत्र राज्यों का अस्तित्व था।



एकचक्रा का बाहुबाण वंश –

• अल्लाटनाथ सूरी की कृति निर्णयामृत में एकचक्रा पुरी के 7 राजाओं का उल्लेख है ।
• एकचक्रा की पहचान वर्तमान यमुना के पर्वतीय प्रदेश में स्थित चकरोता से की जाती है।
• अल्लाटनाथ सूरी इस वंश के पांचवें नरेश राजा सूर्यसेन के आश्रित कवि थे।

कंडारा का दुमग राज्य –

• टिहरी गढ़वाल राज्य अभिलेखागार में एक हस्तलेख में मंदाकिनी घाटी में इस राज्य के होने का उल्लेख है।
• डुमग राजा भानुप्रताप के पुत्र मंगल सिंह ( मंगलसेन) के कंडारागढ़ क्षेत्र में शासन करने का उल्लेख है।
• कंडारागढ़ का अंतिम राजा नरवीर सिंह माना जाता है।
• कालांतर में यह राज्य परमारों के अधीन हो गया।

मणदेव का राजवंश –

• इस राजवंश का उल्लेख गुप्तकाशी के पास नाला में एक मंदिर में किया गया है।( 1246)
• मणदेव का शिलालेख मंदिर के द्वार पर उत्कीर्ण है।

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